शाम ढलने की कोशिश ही कर रही थी , क्योंकि अगर ढल जाती तो दस मिनट में भी ढल सकती थी। अभी दिन का उजाला थमा हुआ था। पहाड़ों के बीच बसे उस छोटे से गाँव के एक टीले पर मोहन और सुमन बैठे थे। दोनों एक ऐसे फ़ैसले पर अटके थे, जो उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाला था।
या तो दोनों हमेशा के लिए एक हो जाते, या आज के बाद दोनों के रास्ते अलग-अलग हो जाते।
मोहन का इस दुनिया में कोई नहीं था, बस एक बूढ़े चाचा थे। सुमन के माँ-बाप इस रिश्ते के लिए राज़ी तो थे, लेकिन उनकी एक शर्त थी। वे अपनी इकलौती बेटी को आँखों से दूर नहीं भेजना चाहते थे। वे चाहते थे कि मोहन इसी गाँव में रहकर खेती संभाल ले, या पास के कस्बे में कोई छोटी-मोटी दुकान डाल ले।मोहन ने खड़े होकर अपनी पोटली उठाई और सुमन की तरफ देखा, उसकी आँखों में विवशता थी। उसने कहा, "सुमन, शहर में एक नई ज़िंदगी इंतज़ार कर रही है। शहर हमें जीवन को नई उँचाई मिलेगी , मुझे इस तरह नहीं रहना है। मुझे तो जाना ही है। क्या तुम भी मेरे साथ चलोगी ?"
सुमन ने नीचे झुककर टीले की मिट्टी को अपनी मुट्ठी में भींचा। एक तरफ माँ-बाप का आँचल था, दूसरी तरफ उसका प्यार। उसने कांपती आवाज़ में कहा, "मोहन, शहर तुम्हें पहचान दे सकता है, लेकिन यह मिट्टी तुम्हें अपनापन देती है। वो शहर जिसे तुम जानते भी नहीं।तुम्हें भी वहां कोई नहीं जानता। उस शहर पर इतना यकीं है। और ये गांव जिसकी गली कूचे भी शायद पहचानते हो, उनको छोड जाना ठीक है।
सुमन कुछ देर चुप रही फिर एक गहरी साँस के साथ बोली: शहर किसी का नहीं हुआ मोहन, अपना भी नहीं होगा , मतलब से रिश्ते बनेंगें और बिगडेंगें। और फिर क्या मेरे प्यार की कीमत एक शहर से कम है?"
दूर से बस का हॉर्न गूंजा। मोहन के कदम ठिठक गए। मोहन के लिए फैसले की घडी अब थी। सुमन ने तो अपना फैंसला सुना दिया , मोहन जो खुद अब तक अपने फैंसले पर कायम था उसके कदम जैसे वही चिपक गए थे, आगे बढने को तैयार नहीं थे। बस सिर्फ दो मिनट की दूरी पर थी। मोहन ने बस की तरफ देखा, फिर सुमन के उन आंसुओं को देखा जो ढलती हुई शाम की आखिरी किरण में चमक रहे थे।
बस आई और चली गई। टीले पर अब अंधेरा घिर आया था।
मोहन वापस सुमन के पास बैठ गया, उसका हाथ अपने हाथ में लिया और पहले हल्का गुस्सा दिखाते हुए बोला, " हमेंशा आखरी में ही बोलती है, घर से निकले तब भी बोल सकती थी। फिर मुस्कुरा कर बोला, "शहर में इमारतें ऊँची हो सकती हैं सुमन, लेकिन इन पहाड़ों से ऊँचा मेरा प्यार है। कल सुबह हम कस्बे में दुकान के लिए जगह देखने चलेंगे।"
शाम ढल चुकी थी, लेकिन एक नई सुबह की उम्मीद के साथ ........।
सीख : यह कहानी हमें ये सिखाती है, कि हमें बडे गोल या उद्देश्य पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर, एक छोटी सी शुरुआत करनी चाहिए। मोहन को शहर जाकर वहां जीरो से शुरु करना पडता। अपने रिसोर्सेज की कदर करें। क्योंकि सफलता सिर्फ अच्छे रिसोर्सेज से नहीं मिलती है। सही फैसले और सही दिशा , सतत मेहनत , लगन से मिलती है। और आगे बढने के लिए अपनों का साथ होना भी जरूरी है। सफलता केवल चमचमाते हुए बड़े शहरों या बड़े संसाधनों की मोहताज नहीं होती। यदि आपके पास सही दिशा, सतत मेहनत, लगन और अपनों का अटूट साथ है, तो आप एक छोटे से कस्बे से भी अपने सपनों का साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं।
अब एक सवाल आपके लिए! 👇
दोस्तों, अगर आप मोहन की जगह होते, तो क्या शाम के सात बजे वाली बस पकड़कर शहर चले जाते या सुमन की बात मानकर अपनी मिट्टी में रहकर ही कुछ बड़ा करने का फैसला करते? आपके जीवन का सबसे कठिन फैसला क्या था?
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